शिव स्तुति
जन्म लिया और जग देखा कानों में जो ध्वनि पड़ी, उसका सर्जक कौन था? भव ऊर्जा का शक्ति स्त्रोत पता नहीं क्यों मौन था? माता को कुछ गाते देखा किसी मंदिर, नित्य ही जाते देखा भस्म समेटे, सर्प लपेटे किसी शिला को फिर, नहलाते देखा चंद्र सुसज्जित जिसके सर पे उस छवि के पीछे कौन था? भव ऊर्जा का शक्ति स्त्रोत पता नहीं क्यों मौन था? अहम् कार त्यागा मैंने और छोड़ा अपना मद आलस उस शक्ति का फिर किया ध्यान चेतन मन से अपने भीतर वो निर्विकल्प, वो निराकार वह ओंकार आसित सबमें जिनको ढूंढा, हर जगह था मैंने व्याप्त हैं वो शिव, कण-कण में याद मुझे है, अब भी भगवन डमरू का वो प्रबल नाद नष्ट हुआ अज्ञान तिमिर अस्त हुए सब जर विषाद वसुधा के आंचल में टंकित अचल शैल, वो स्थिर महिधर आसन बना, हैं जिनपर बैठे चिर निद्रा में योगी शंकर कर्मयोग पुष्पित रहे हे विरुपाक्ष, हे वामदेव विनती केवल इतनी तुमसे हे उमापति, हे महादेव।


तुषार भाई, आपकी यह कविता अपने आप में एक रुद्राभिषेक है। इससे बढ़कर भला और क्या रुद्राभिषेक या जलाभिषेक हो सकता है! आपने अपनी लेखनी के माध्यम से भगवान शिव को जो भाव अर्पित किए हैं, वे सचमुच अद्भुत और हृदयस्पर्शी हैं।
महादेव की असीम कृपा आप पर सदैव बनी रहे। 🙏🔱
Did you sing as well, I just saw the audio attached below…. It’s beautiful!!