चाँद
वह कहती— चाँद हो तुम। सैंकड़ों मौन रस्ते, गीत गाते, मेरे खिलखिलाते चाँद। तन्हा तपती रातों में, मेरे संग जगते, दिल लुभाते चाँद। तुम्हें मैं घेर बाहों में, कलेजे से लगा लूँ, चूम कर खुश्क लब तेरे, नगीने भी सजा दूँ। मैं लजाते बोल पड़ता— चाँद हूँ गर मैं, तो फिर तुम आसमां हो, मेरा हाथ थामे जाँ, इक गुल-ब-दामाँ हो। यह रोज़ का मेरा पिघलना, एक साज़िश है; फ़ना होकर तुम्हें भी चाँद करना, मेरी ख्वाहिश है।


lovely poem. wish i could restack the lines but i think you wrote this in the poetry format on substack so the lines cannot be restacked.
The last para is soo beautiful sir !! Loved it. ✨❤️