रेलगाड़ी
एक साधारण सी कविता
चाँदनी रात है, दूधिया रोशनी से नहाए खेतों के बीचोंबीच एक रेलगाड़ी सरपट भागती जा रही है। गांवों, शहरों और कस्बों की टिमटिमाती बत्तियों से सजे इस रंगमंच पर, जहाँ-जहाँ से ये गुजरती है, वहाँ-वहाँ सैंकड़ों कहानियां बुनी जा रहीं... ये लाल वाला घर जो अभी-अभी गुजरा है, उसमें एक गुड़िया, अपने बस्ते में सजी जिल्द लगी नई किताबों को, सोने से पहले जाने कितनी बार खोल-देख रही है— कल उसके स्कूल का पहला दिन है। उधर दूर, विशालकाय वृक्षों की ओट में जो गांव थोड़ा जगमग दिख रहा है, वहाँ लाउडस्पीकर पर गूंजते थोड़े ऊबड़-खाबड़, पर मधुर लोकगीतों के बीच, एक नई दुल्हन ब्याह कर आई है। और अपनी छत पर टहल रहा कोई अकेला शख्स ट्रेन की सीटी सुन गहरी यादों में उतर गया है, उसे परदेस में बसे किसी अपने की याद आ रही है। फिर अचानक... इन शांत बस्तियों को पीछे छोड़ती, आधी रात को ऊंघते चायवालों को जगाती, अपनी चकाचौंध और शोर से गरबीला सा यह कोई बड़ा शहर आता है, जिसकी हड़बड़ाहट में दूधमुंहे बच्चे चौंककर रोने लगे हैं। इठलाती, गरजती, पटरियां रौंदती, भागती रेलगाड़ी चले जा रही है। उतरते-चढ़ते इंसानों की लंबी कतारें, और पहियों पर सरपट भागती जिंदगी... यहाँ शाम ढलती है, और सुबह अंगड़ाई ले उठ बैठती है। जीवन रुकता नहीं, वक्त ठहरता नहीं, वह बस चलता रहता है— किसी रेलगाड़ी की तरह।


अद्भुत observation 😊
Beautifully painted the picture!