अनायास
collection
1. संशयों का एक मायावी दानव तैयार बैठा था लीलने को सारी उम्मीदें, सारे सपने कर देने को निष्प्राण तैयार बैठा था मन में ढूंढने को एक कोना जो मिलते ही कर दे मुझे निहत्था और उड़ेल दे ढेर सारा विष हताशा, संदेह, और दुःख कितने ही रातें मैं हतभागा मृत्युदंड की प्रतीक्षा करता बिखरता रहा कतरा कतरा टूटती रही हर सांस *** फिर एक सुबह घर से थोड़ी दूर चलते हुए हवा का एक हल्का सा झोंका मुझे चूम गया बरबस और मन में डेरा जमाए बैठा हुआ वो निष्ठुर दानव थोड़ी देर, बस थोड़ी देर के लिए गायब हो गया था मैने तय किया, कि अब यूं ही नहीं बीतेंगे दिन बेबसी में, अपराधबोध में ले आऊंगा रोशनी रात चांदनी से मांग ऐसी दुनिया बनाऊंगा जिसमें बरसेगा प्रेम और उमड़ आयेगा जीवन चहुंओर।
2. उठती बैठती मूक सांसे। तेज गिरती बारिश से धुलकर, और चटख होती, इक धुंधली-सी याद! होठों के नीचे एक नन्हा सा तिल। उसकी डूबती नजरों में गोते खाता, दुनिया में, पर दुनिया से दूर, बेसुध,अनुरक्त और मदांध मैं। ढलती शाम। वापस लौटते पंछी। रेत की तरह फिसलता दिन। मेज पर चीखती किताबें। इक उलझी, अतृप्त, असहाय प्यास। मेज पर चीखती किताबें। बाहर बुलाते अमलतास के फूल। इन सबके बीच, स्वयं को भूल जाने की चाह। खुश, तटस्थ, बेपरवाह मैं!
3. दफ्न है सैंकड़ों रुबा'इयाँ मुझमें छुप गईं इस भीड़ में तनहाइयां मुझमें लोग कहते हैं मैं झूठा हूं फरेबी हूं ढूंढते हैं अपनी ही परछाइयां मुझमें चाहते हो फिर तराशूं नज़्म कोई बेरहम! क्या लूट लोगे जो बची अंगड़ाइयां मुझमें दिल्लगी है दिल्लगी को दिल्लगी का नाम दो मत करो रौशन चराग़-ए-आशनाईयां मुझमें
4. [कभी] मैं फिसलता बिखरता रेत की तरह वो समेटती, बांधती बिला शिकवा [कभी] एकसार होते हम दोनों वह इक मीठी प्यास खारा मैं [कभी] ईर्ष्यालु देवता न्यायाधीश लोग धधकते अंगारों की तरह टूटते बरसते [हमेशा] शीतल शाश्वत सरसता प्रेम
5. उबलते पानी की नाचती बूंदे आंच रोकते ही पड़ जाती हैं, समतल। जैसे दिल टूटने के बाद महसूस होती है एक गहरी रिक्तता, दिखता है सब सपाट और बेरंग। जैसे लंबे ज्वर से ठीक होकर हस्पताल से घर लौटते बच्चे को लगता है सबकुछ, शांत, गतिहीन, ठंडा। इतवार की अलसाई दुपहरियों में खाली सड़कें, जैसे दुनिया की सारी घड़ियां पड़ गईं हों बंद। इस बेरंग, सपाट, गतिहीन, ठंडी रिक्तता का नाम ही जीवन है। इसके अलावा सबकुछ इंसानी कारगुज़ारी है, शैतानी है, फांस है।
6. वो भी क्या दिन थे कि जब न चाह थी न प्यार था एक कम-बख़्त मैं ही था, दूजा कोई नहीं हुशियार था थे चंद लोग और चंद किस्से,न बस्ती थी न बाज़ार था खुला आसमां था ऊपर मेरे, दिल ऐसे न बेकरार था गर्मी की दुपहरी एक बदमस्त बयार गीत गाती थी गुल ही गुल थे बज़्म में, न कांटे थे न अग्यार था
7. आसमान की छप्पर से, गुमसुम लटकता, ये तन्हा चांद, चांद तभी तक है, जब तक दूर है।पास होता— पत्थर का टुकड़ा होता। जायज़ हैं दूरियां, शायद, इसी वजह। मिलना— सबकी तक़दीर नहीं।
8. तलछटे सा पसरा मेरा सुषुप्त क्रंदन, जैसे निकाल फेंका हो उफनती चाय के ऊपर का गाद। जंगल बढ़ता रहा, छा रहा था अंधियारा, डरा, सहमा, जड़ें नोच-नोच मैं फेंकता गया... कुछ ने तालियां बजाईं, कुछ को कुढ़न हुई, सबने कहा - “क्या खूब कविता है!"
9. हज़ार ग़म छुपाना, बिला वज़ह मुस्कुराना, हुनर है दिल बहलाना भी। एक आदत है जिए जाना भी। कि हर पल नहीं रहती, खिली ये शाख फूलों की। महज़ मायूसियां भी, घेर लेती हैं बेफ़िज़ूलों सी। फ़न है, गुनगुनाना भी। एक आदत है जिए जाना भी। एक लफ्फाज़ था, हर वक्त, ख़ुदा की कसमें खाता था। हसीं सपने सुनाता था, कहता, जां लुटाता था। लाज़िम है उसे भुलाना भी। एक आदत है जिए जाना भी।
10. जल रहा था मैं और उसने धुएं की शिकायत की थी मेरे बदन से फूट रही चिंगारियों को ढोंग कहा था उसे नहीं चाहिए थे हारे हुए लोग जलते, वक्त के मारे हुए लोग प्रमाण चाहिए थे उसे बलिदानों की भूत की और भविष्य की उसे चाहिए था साफ़ सुथरा शिष्ट प्रेमी जिसे मालूम हो व्यापार के सारे नियम मैं मूरख प्रेमी मेरी कोई चाह न थी प्रेम शब्द का ज़िक्र भी नहीं किया कभी वर्तमान में ही डूबा हुआ ढूंढ रहा था ईश्वर, उससे होकर सब में।
11. न महुए छुए ना आंख लगाई जोगी-सा किसी वट के नीचे कभी ना हमने, धूनी रमाई स्मृतियों को तह में, फिर आज कौन ये रंगता है मौसम की बदली सूरत कोई प्रपंच लगता है बूंद-बूंद से निर्मल करता प्राण सहित पूरे तन को बारिश है या इंद्रजाल जो उन्मत कर दे कण-कण को द्वंद्वों में पलते जीवन को रहती है आस कहां बूंदों की? आंखों का रंग गिर जाता है कंटक पथ के बाशिंदों की प्रेम सुधा की बारिश कब तक रोक सकेगा जिद्दी मन गीत, प्रीत का रचते बुनते चमकेगा होकर और सघन
12. प्रेमिकाएं अभिनत थीं उन्होंने उन्मुक्त कंठ से स्तुति की, गीत गाए उनके स्वामित्व और अपेक्षाओं ने चीख चीखकर रिक्त विज्ञप्त किया। जब भी गईं तोड़ गईं। नायिकाएं कठोर थीं उनका दर्पण सिर्फ उनकी ओर ही खुलता था। स्वयं को निहारते, इठलाते झांक लेती थी कभी कभार मेरी ओर कनखियों से। सौंदर्य बल से उन्होंने उपासना मांगी, चाही एक मधु लिप्त दासता। कुछ लड़कियां ऐसी थीं जिनके स्नेह और समर्पण ने ख़ूब संजोया, संवारा। प्रीत की लहलहाती फ़सल देख ख़ुद खिलखिलाईं, चहकीं पर बदले में कुछ नहीं मांगा फिर अनायास समाज के एक इशारे पर कुव्यवस्थाओं के घनघोर अंधेरे में ओझल हो गईं। फिर कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने स्तुति तो की, पर आंखों में आंखे डाल उपासना भी मांगी। कुव्यवस्थाओं को ठुकरा उड़ती रहीं स्वच्छंद, उनके प्रेम ने मुझे सशक्त किया और वे स्वयं भी निखरी हो दिव्य। ऐसी देवियों, स्वामिनियों की प्रशंसा में मैंने गीत रचे, कविताएं गढ़ी अविरत।


Initially it flowed like a story..