इतना सुंदर कि इसी तरह NCERT की किताब में छप जाना चाहिए। और जैसे घर में बहुत अच्छी पनीर की सब्ज़ी बन जाने पर मुंह से निकल जाता है कि लगता ही नहीं कि घर में बना है, इस कृति के बारे में कहना चाहूंगी कि लगता ही नहीं इक्कसवीं सदी के किसी मॉडर्न आदमी ने लिखी है बहुत अद्भुत!
बहुत शुक्रिया। थोड़ी जोड़ तोड़ और महान रचनाकारों के अनुकरण से यह संभव हो पाया है। आजकल हिन्दी में रचना मुख्यतः खड़ी बोली या उर्दू में होती है। और इसके व्यवहारिक कारण भी हैं जैसे सुलभ और सर्वमान्य होना। ब्रजभाषा मेरी मातृभाषा नहीं है परंतु श्रीकृष्ण पर लिखने के लिए इससे उपयुक्त कोई और अन्य भाषा भी नहीं लगी। और कुछ कहने, महसूस करने की इतनी तीव्रता थी कि मानको और त्रुटिपूर्ण लिखने का भय त्याग दिया। ब्रजभाषा की उतनी जानकारी नहीं, इसलिए मन के भाव सीमित ही प्रसारित हो पाए। खैर, मन को तो बहुत शांति मिली।
इतना सुंदर कि इसी तरह NCERT की किताब में छप जाना चाहिए। और जैसे घर में बहुत अच्छी पनीर की सब्ज़ी बन जाने पर मुंह से निकल जाता है कि लगता ही नहीं कि घर में बना है, इस कृति के बारे में कहना चाहूंगी कि लगता ही नहीं इक्कसवीं सदी के किसी मॉडर्न आदमी ने लिखी है बहुत अद्भुत!
बहुत शुक्रिया। थोड़ी जोड़ तोड़ और महान रचनाकारों के अनुकरण से यह संभव हो पाया है। आजकल हिन्दी में रचना मुख्यतः खड़ी बोली या उर्दू में होती है। और इसके व्यवहारिक कारण भी हैं जैसे सुलभ और सर्वमान्य होना। ब्रजभाषा मेरी मातृभाषा नहीं है परंतु श्रीकृष्ण पर लिखने के लिए इससे उपयुक्त कोई और अन्य भाषा भी नहीं लगी। और कुछ कहने, महसूस करने की इतनी तीव्रता थी कि मानको और त्रुटिपूर्ण लिखने का भय त्याग दिया। ब्रजभाषा की उतनी जानकारी नहीं, इसलिए मन के भाव सीमित ही प्रसारित हो पाए। खैर, मन को तो बहुत शांति मिली।
अवधी में भी पहली बार लिखा है, https://www.kavyapath.com/p/8e2 पर पढ़ा जा सकता है। आपका बहुत धन्यवाद।
वाह! कितनी सुंदर रचना है😊
बड़े दिनों बाद कोई भक्ति भोर कृति पाढ़ी!
बहुत ही मार्मिक और सुन्दर ढंग से शब्दों को पिरोया है अपने!
बहुत शुक्रिया।